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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

7.'नेताजी का चश्मा'

प्रस्तुत पाठ प्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश द्वारा रचित अत्यंत मार्मिक कहानी 'नेताजी का चश्मा' पर आधारित है। यह कहानी 'कैप्टन चश्मेवाले' के माध्यम से देश के करोड़ों सामान्य नागरिकों और बच्चों के अनाम योगदान तथा उनकी सच्ची देशभक्ति को रेखांकित करती है।

  • नेताजी की अधूरी मूर्ति: एक छोटे से कस्बे के मुख्य चौराहे पर नगरपालिका द्वारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति (बस्ट) लगवाई गई थी। बजट और समय की कमी के कारण यह काम स्थानीय स्कूल के ड्राइंग मास्टर मोतीलाल को सौंपा गया था। मूर्ति बहुत सुंदर और प्रेरणादायक थी, लेकिन मूर्तिकार नेताजी की आँखों पर संगमरमर का चश्मा बनाना भूल गया था।

  • कैप्टन चश्मेवाले की देशभक्ति: हालदार साहब जब भी कंपनी के काम से उस कस्बे से गुज़रते, तो मूर्ति पर एक असली चश्मा देखते, जो हर बार बदल जाता था (कभी गोल, कभी चौकोर, कभी लाल)। पानवाले से पूछने पर पता चला कि यह काम 'कैप्टन चश्मेवाला' करता है। कैप्टन एक बेहद बूढ़ा, लँगड़ा और गरीब फेरीवाला था, जो एक बाँस पर अपने चश्मे टाँगकर बेचता था। उसे नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति आहत करती थी, इसलिए वह अपनी ओर से एक फ्रेम नेताजी को पहना देता था।

  • पानवाले का मज़ाक: जब ग्राहक नेताजी की मूर्ति पर लगा हुआ फ्रेम माँगता, तो कैप्टन मूर्ति से वह फ्रेम उतारकर ग्राहक को दे देता और नेताजी को दूसरा चश्मा पहना देता। हालदार साहब कैप्टन की इस देशभक्ति के समक्ष नतमस्तक थे, लेकिन पानवाले द्वारा एक सच्चे देशभक्त का यह कहकर मज़ाक उड़ाना कि "वो लँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में, पागल है पागल!", उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।

  • कैप्टन की मृत्यु और निराशा: लगभग दो साल तक हालदार साहब मूर्ति पर बदलते चश्मे देखते रहे। एक दिन उन्होंने देखा कि मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं है; पानवाले ने उदास होकर बताया कि कैप्टन मर गया है। यह जानकर हालदार साहब बेहद दुखी हुए और सोचने लगे कि उस देश का क्या होगा जहाँ के लोग देश पर सर्वस्व न्योछावर करने वालों पर हँसते हैं।

  • सरकंडे का चश्मा और नई उम्मीद: पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब दोबारा उधर से गुज़रे, तो उन्होंने तय किया था कि वे बिना चश्मे वाली मूर्ति की तरफ नहीं देखेंगे। लेकिन आदत से मजबूर उनकी नज़रें चौराहे पर उठ गईं। उन्होंने देखा कि नेताजी की आँखों पर बच्चों द्वारा बनाया गया 'सरकंडे का चश्मा' रखा हुआ था। यह देखकर हालदार साहब भावुक हो गए और उनकी आँखें भर आईं, क्योंकि उन्हें यह तसल्ली मिल गई कि देशभक्ति अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि नई पीढ़ी (बच्चों) के भीतर भी सुरक्षित है।


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