https://drive.google.com/file/d/1YkeLPk5NkCBqnLjmwb3P_4SUrrNAxGNh/view?usp=drivesdk
बुधवार, 9 सितंबर 2026
मंगलवार, 8 सितंबर 2026
‘आखिरी चट्टान तक’
‘आखिरी चट्टान तक’
लेखक कन्याकुमारी पहुँचकर समुद्र के किनारे भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता है। यह स्थान अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है। समुद्र की विशाल लहरों और चट्टानों को देखकर लेखक प्रकृति की अपार शक्ति और भव्यता से प्रभावित होता है। इसी क्षेत्र की एक चट्टान पर स्वामी विवेकानंद ने ध्यान किया था।
लेखक सूर्यास्त देखने के लिए रेत के टीलों की ओर जाता है। वह ऊँचे-ऊँचे टीलों को पार करता हुआ ऐसा स्थान खोजता है जहाँ से सूर्यास्त का पूरा दृश्य दिखाई दे सके। अंत में वह समुद्र में डूबते सूर्य का अद्भुत दृश्य देखता है। सूर्य के बदलते रंग—सोने, लाल, बैंगनी और फिर काले—लेखक को बहुत प्रभावित करते हैं।
अँधेरा होने पर लेखक समुद्र के किनारे से वापस लौटता है। रास्ते में वह रेत के अनेक सुंदर रंगों और समुद्र की बदलती स्थिति को देखता है। बढ़ते पानी के कारण उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता है, लेकिन वह साहस और सूझबूझ से सुरक्षित वापस लौट आता है।
अगले दिन लेखक नाव से विवेकानंद चट्टान पर जाता है। वहाँ उसकी मुलाकात एक पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक से होती है। युवक बताता है कि कन्याकुमारी में बहुत से शिक्षित युवक बेरोजगार हैं और जीविका के लिए छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं। इससे लेखक को प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ समाज की वास्तविक समस्याओं का भी अनुभव होता है।
इस प्रकार यह यात्रा-वृत्तांत केवल कन्याकुमारी के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं करता, बल्कि प्रकृति की भव्यता, मनुष्य की संवेदनाओं, साहस और बेरोजगारी जैसी सामाजिक समस्याओं को भी सामने लाता है।
ऐसी भी बातें होती हैं
ऐसी भी बातें होती हैं
ऐसी भी बातें होती हैं पाठ का सारांश
‘ऐसी भी बातें होती हैं’ पाठ यतींद्र मिश्र द्वारा महान गायिका लता मंगेशकर से लिया गया एक रोचक और प्रेरणादायक साक्षात्कार है। इसमें लता जी अपने बचपन, परिवार, पिता, संगीत-साधना और जीवन के अनेक अनुभवों के बारे में सहजता से बताती हैं।
लता जी अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर को अपना सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत मानती हैं। उनके पिता बहुत अनुशासनप्रिय और महान संगीतज्ञ थे। उन्होंने लता जी और उनके भाई-बहनों को संगीत के साथ-साथ स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जीवन जीने की शिक्षा दी। लता जी ने बचपन से ही पिता से संगीत की शिक्षा प्राप्त की और कठिन परिस्थितियों के बावजूद संगीत के क्षेत्र में निरंतर साधना करती रहीं।
साक्षात्कार में लता जी अपने बचपन की अनेक स्मृतियाँ, परिवार के साथ बिताए समय, त्योहारों और संगीत से जुड़े अनुभवों को साझा करती हैं। वे बताती हैं कि सफलता प्राप्त करने के लिए केवल प्रतिभा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि निरंतर अभ्यास, अनुशासन, धैर्य और समर्पण भी आवश्यक हैं।
लता जी के जीवन में अनेक संघर्ष आए, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए संगीत के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी बातें उनकी सरलता, विनम्रता, मेहनत और संगीत के प्रति गहरी निष्ठा को प्रकट करती हैं।
इस प्रकार यह पाठ केवल लता मंगेशकर के जीवन का परिचय नहीं देता, बल्कि हमें मेहनत, अनुशासन, आत्मसम्मान, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण की प्रेरणा भी देता है।
संवादहीन
संवादहीन
संवादहीन — पाठ का सारांश
शेखर जोशी की कहानी ‘संवादहीन’ एक वृद्ध ग्रामीण महिला ताई के अकेलेपन और उसके जीवन में संवाद के महत्व को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। कभी ताई का घर परिवार और पशु-पक्षियों से भरा-पूरा था, लेकिन समय के साथ उनके बेटे-बहू शहर चले गए और बेटियाँ भी अपने परिवार में व्यस्त हो गईं। धीरे-धीरे ताई का घर सूना हो गया और वे अकेली रह गईं।
ताई के इस अकेलेपन को दूर करने के लिए गनपत उनके लिए एक पहाड़ी तोता लाता है। ताई उसका नाम मिट्ठू रखती हैं। मिट्ठू धीरे-धीरे ताई के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। ताई उससे बातें करती हैं, उसकी पसंद का भोजन जुटाती हैं और उसकी देखभाल करती हैं। मिट्ठू के साथ बातचीत करके ताई को अपने अकेलेपन से राहत मिलती है।
कहानी में जगन मास्टर का पात्र भी महत्वपूर्ण है। वे मिट्ठू को पिंजरे में बंद देखकर उसकी स्वतंत्रता के पक्ष में सोचते हैं। उनके विचार में पक्षी को स्वतंत्र रूप से उड़ना चाहिए। उनके प्रभाव से मिट्ठू को खुले में छोड़ दिया जाता है और वह उड़ जाता है।
मिट्ठू के चले जाने से ताई बहुत दुखी हो जाती हैं, क्योंकि वह उनके लिए केवल एक पक्षी नहीं था, बल्कि उनका संवाद-साथी और अकेलेपन का सहारा था। बाद में उनके लिए दूसरा तोता लाया जाता है, लेकिन वह मिट्ठू की तरह ताई से बातचीत नहीं करता। इससे ताई का अकेलापन और अधिक गहरा हो जाता है।
इस प्रकार कहानी यह बताती है कि मनुष्य के जीवन में संवाद और अपनापन कितना आवश्यक है। परिवार और समाज से दूर हो जाने पर व्यक्ति भौतिक रूप से सब कुछ होते हुए भी भीतर से अकेला हो सकता है। कहानी बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम तथा आदर्श और यथार्थ के बीच संतुलन का संदेश देती है।
मुख्य भाव:
‘संवादहीन’ कहानी के माध्यम से लेखक ने बुजुर्गों के अकेलेपन, पारिवारिक दूरी, पलायन, मानवीय संवेदना और संवाद के महत्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।