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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

1.सूरदास

प्रस्तुत पाठ भक्तिकाल के श्रेष्ठ कवि सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' प्रसंग से लिया गया है। इसमें मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव के माध्यम से गोपियों को भेजे गए योग-संदेश और उस पर गोपियों की प्रतिक्रिया का मार्मिक वर्णन है। इस पाठ के चारों पदों का सार निम्नलिखित है:

  • पहला पद (उद्धव पर व्यंग्य): गोपियाँ उद्धव को व्यंग्य में 'बड़भागी' (भाग्यशाली) कहती हैं क्योंकि वे कृष्ण के समीप रहकर भी उनके प्रेम से वैसे ही अछूते हैं जैसे जल में रहकर भी कमल का पत्ता या तेल की गगरी। गोपियाँ स्वयं को भोली अबला बताती हैं, जो कृष्ण के प्रेम में वैसे ही चिपकी हैं जैसे गुड़ से चींटियाँ।

  • दूसरा पद (विरह वेदना और मर्यादा): गोपियाँ स्वीकार करती हैं कि कृष्ण से मिलने की उनकी सारी अभिलाषाएँ मन में ही रह गईं। वे कृष्ण के आने की आस में वियोग सह रही थीं, लेकिन उद्धव के शुष्क योग-संदेश ने उनकी विरहाग्नि को और भड़का दिया। वे शिकायत करती हैं कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का पालन नहीं किया ('मरजादा न लही')।

  • तीसरा पद (एकनिष्ठ प्रेम): गोपियों ने कृष्ण को 'हारिल की लकड़ी' के समान बताया है जिसे उन्होंने मन, कर्म और वचन से अपने हृदय में दृढ़तापूर्वक पकड़ रखा है। उन्हें उद्धव का योग-संदेश 'कड़वी ककड़ी' के समान अरुचिकर लगता है। वे कहती हैं कि यह योग का ज्ञान उन्हें सौंपें जिनका मन चंचल (चकरी के समान) है, क्योंकि गोपियों का मन तो केवल कृष्ण में स्थिर है।

  • चौथा पद (कृष्ण की राजनीति और राजधर्म): गोपियाँ ताना मारती हैं कि कृष्ण अब मथुरा जाकर 'राजनीति' पढ़ आए हैं और बहुत चतुर हो गए हैं। जो कृष्ण पहले दूसरों को अन्याय से बचाते थे, वे ही अब योग-संदेश भेजकर गोपियों पर अन्याय (अनीति) कर रहे हैं। अंत में गोपियाँ उद्धव को सच्चा 'राजधर्म' याद दिलाती हैं, जिसके अनुसार राजा का कर्त्तव्य अपनी प्रजा को सताना नहीं, बल्कि उनके हितों की रक्षा करना है।


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2.'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद'

प्रस्तुत पाठ महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के 'बाल कांड' से लिया गया है। यह अंश सीता स्वयंवर में राम द्वारा शिव-धनुष भंग किए जाने के बाद का अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद' है। 

  • परशुराम का क्रोध और राम की विनयशीलता: शिव-धनुष के टूटने का समाचार पाकर मुनि परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर जनक की सभा में आते हैं। वे धनुष तोड़ने वाले को अपना शत्रु (सहस्रबाहु के समान) बताते हैं। उनके क्रोध को शांत करने के लिए राम अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि इस शिव-धनुष को तोड़ने वाला उनका ही कोई दास होगा।

  • लक्ष्मण का व्यंग्य: राम की विनम्रता के विपरीत, लक्ष्मण परशुराम पर मुसकुराते हुए व्यंग्य करते हैं। वे कहते हैं कि लड़कपन में उन्होंने ऐसी बहुत सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब तो मुनि ने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। इस पुराने धनुष पर उनकी इतनी ममता क्यों है? लक्ष्मण यह भी तर्क देते हैं कि राम ने तो इसे नए के धोखे में केवल छुआ था और यह कमज़ोर धनुष टूट गया, इसमें राम का कोई दोष नहीं है।

  • परशुराम की आत्म-प्रशंसा और अहंकार: लक्ष्मण के व्यंग्य वचनों से परशुराम आग-बबूला हो जाते हैं। वे अपने भयानक फरसे (कुठार) की ओर इशारा करते हुए अपनी वीरता का बखान करते हैं। वे स्वयं को बाल-ब्रह्मचारी, अत्यंत क्रोधी और क्षत्रिय-कुल का नाशक बताते हैं, जिन्होंने अपने भुजबल से इस धरती को कई बार क्षत्रियों से विहीन कर दिया था।

  • लक्ष्मण की निडरता और रघुकुल की मर्यादा: लक्ष्मण परशुराम की धमकियों से बिल्कुल नहीं डरते। वे कहते हैं कि वे कोई 'कुम्हड़बतिया' (काशीफल का कमज़ोर फूल) नहीं हैं जो तर्जनी उँगली दिखाने से मुरझा जाएँ। लक्ष्मण अपने कुल की मर्यादा बताते हुए कहते हैं कि रघुकुल में देवता, ब्राह्मण, हरिजन (ईश्वर के भक्त) और गाय पर शूरवीरता नहीं दिखाई जाती, क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है।

  • वचनों का प्रहार: लक्ष्मण कटाक्ष करते हैं कि परशुराम के तो वचन ही करोड़ों वज्रों के समान कठोर हैं, उन्होंने व्यर्थ ही धनुष-बाण और फरसा धारण किया हुआ है।

  • काव्य-शौर्य: यह पूरा प्रसंग अवधी भाषा में दोहा-चौपाई छंद में रचित है। इसमें परशुराम के क्रोध (रौद्र रस) और लक्ष्मण की निडरता व व्यंग्योक्तियों (वीर रस) का अत्यंत सजीव, ओजपूर्ण और नाटकीय टकराव देखने को मिलता है।


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