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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

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सोमवार, 21 सितंबर 2026

कक्षा -12 श्रम विभाजन और जाति-प्रथा

 श्रम विभाजन और जाति-प्रथा

  • डॉ. आंबेडकर जाति-प्रथा को स्वाभाविक श्रम विभाजन मानने वाले तर्कों का कड़ा विरोध करते हैं

  • उनके अनुसार, जाति-प्रथा केवल श्रम का विभाजन नहीं करती, बल्कि यह श्रमिकों का एक अस्वाभाविक विभाजन करती है और विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच का दर्जा देती है

  • यह प्रथा व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि, क्षमता या प्रशिक्षण पर आधारित नहीं है, बल्कि जन्म (गर्भधारण) के समय ही माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार मनुष्य का पेशा निर्धारित कर देती है

  • जाति-प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बाँध देती है और विपरीत परिस्थितियों में भी पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती, जिससे यह भारत में बेरोजगारी और भुखमरी का एक प्रत्यक्ष कारण बन गई है

  • जब व्यक्ति विवशतावश अरुचि के साथ कोई कार्य करता है तो उसकी कार्य-कुशलता घटती है, अतः आर्थिक दृष्टि से भी जाति-प्रथा अत्यंत हानिकारक है

मेरी कल्पना का आदर्श-समाज

  • डॉ. आंबेडकर का आदर्श समाज तीन मुख्य तत्त्वों पर आधारित है: स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता

  • भ्रातृता (भाईचारा): समाज में दूध और पानी के मिश्रण की तरह भाईचारा होना चाहिए। एक आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए कि सामाजिक जीवन में संपर्क के अबाध साधन उपलब्ध हों, जिसे वे सच्चे लोकतंत्र का नाम देते हैं

  • स्वतंत्रता: जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के साथ-साथ मनुष्य को अपना पेशा चुनने और अपनी शक्ति का प्रभावशाली प्रयोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। मनपसंद पेशा चुनने की आज़ादी न देना एक प्रकार की 'दासता' है, क्योंकि दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं, बल्कि दूसरों द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने की विवशता भी है

  • समता: मनुष्य शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार (पैतृक संपदा, शिक्षा) और व्यक्तिगत प्रयत्नों की दृष्टि से असमान हो सकते हैं, किंतु इन आधारों पर उनके साथ असमान व्यवहार करना अनुचित है। समाज को अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करने के लिए सभी को आरंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार उपलब्ध कराना चाहिए। राजनीतिज्ञों के लिए भी मानवता के दृष्टिकोण से सभी के साथ समान व्यवहार करना ही एकमात्र व्यावहारिक सिद्धांत है



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