प्रस्तुत पाठ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित प्रसिद्ध ललित निबंध 'शिरीष के फूल' पर आधारित है, जो उनके निबंध संग्रह 'कल्पलता' से लिया गया है
अजेय जिजीविषा और अवधूत स्वरूप: जेठ की भीषण गर्मी और लू के बीच जब पूरी धरती भट्टी की तरह जल रही होती है, तब भी शिरीष का पेड़ एक 'कालजयी अवधूत' (संन्यासी) की तरह अविचल खड़ा रहकर सिर से पैर तक फूलों से लदा रहता है
। यह विपरीत परिस्थितियों और तुमुल कोलाहल के बीच भी जीवन की अजेयता और कर्तव्यशीलता का प्रमाण है । पुरानी और नई पीढ़ी का द्वंद्व: लेखक ने शिरीष के उन पुराने और मजबूत फलों पर व्यंग्य किया है, जो तब तक अपनी डाल से नहीं झड़ते जब तक नए पत्ते और फल उन्हें धक्का मारकर बाहर नहीं कर देते
। यह स्थिति समाज और राजनीति के उन अधिकार-लोलुप पुराने नेताओं को दर्शाती है, जो समय के बदलाव को नहीं पहचानते और नई पीढ़ी द्वारा धकियाए जाने तक अपनी जगह पर जमे रहते हैं । सच्चे कवि की पहचान: द्विवेदी जी के अनुसार, एक सच्चा कवि वही हो सकता है जो कालिदास की तरह 'अनासक्त योगी' की स्थिर-प्रज्ञता और 'विदग्ध प्रेमी' का हृदय एक साथ रखता हो
। जो कवि फक्कड़ नहीं बन सकता और केवल हिसाब-किताब व लेखा-जोखा में उलझा रहता है, वह कभी श्रेष्ठ रचना नहीं कर सकता । गांधी जी से समानता: निबंध के अंत में लेखक शिरीष की तुलना महात्मा गांधी से करते हैं
। जिस प्रकार शिरीष भयंकर लू और थपेड़ों के बीच वायुमंडल से रस खींचकर कोमल और कठोर बना रहता है, उसी प्रकार गांधी जी भी देश में मचे मार-काट, अग्निदाह और कोलाहल के बीच स्थिर रहे और उन्होंने अपने आत्मबल से मानवता का मार्ग प्रशस्त किया ।
1.📥Click here for the quiz
2.📥 Click here to download the PPT
3.📥 Click here to download the PDF
4.📥 Click here to download Competency-Based Questions
5.🧠 Click here to download the Mind Map
6.📚 Click here to download Difficult Words
7.📝 Click here to download the Worksheet
8.📘 Click here to download the Lesson Plan
9.📖 Click here to download Passage-Based Questions

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें