फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा रचित आंचलिक कहानी 'पहलवान की ढोलक' व्यवस्था परिवर्तन के साथ लोक-कला व उसके कलाकार के अप्रासंगिक हो जाने तथा विपत्ति में अदम्य मानवीय जिजीविषा को दर्शाती है
लुट्टन का प्रारंभिक जीवन और दंगल: नौ वर्ष की उम्र में अनाथ हुए लुट्टन ने अपनी विधवा सास को तंग करने वालों से बदला लेने के लिए कसरत करनी शुरू की थी
। श्यामनगर मेले के दंगल में उसने 'शेर के बच्चे' के नाम से प्रसिद्ध पंजाब के अजेय पहलवान चाँद सिंह को चुनौती दी । कुश्ती में उसने अपनी ढोलक की थाप से दाँव-पेंच की प्रेरणा ली और चाँद सिंह को चारों खाने चित कर दिया, जिसके बाद राजा श्यामानंद ने उसे अपना राज-पहलवान बना लिया । व्यवस्था परिवर्तन और राज्याश्रय छिनना: पंद्रह वर्षों तक राज-दरबार का दर्शनीय जीव बने रहने के बाद वृद्ध राजा का देहांत हो गया
। विलायत से आए नए राजकुमार ने सत्ता सँभालते ही दंगल की जगह घोड़े की रेस को दे दी और लुट्टन व उसके बेटों के 'भोजन-व्यय' को अधिक बताकर उन्हें राज-दरबार से निकाल दिया । गाँव वापसी और महामारी का प्रकोप: गाँव के एक छोर पर झोंपड़ी बनाकर लुट्टन नौजवानों को कुश्ती सिखाने लगा, लेकिन किसानों की गरीबी के कारण उसका यह स्कूल भी खाली हो गया
। इसी बीच गाँव में अनावृष्टि के बाद मलेरिया और हैजे की भयंकर महामारी फैल गई, जिससे गाँव में रोज़ दो-तीन लाशें उठने लगीं और चारों ओर मौत का सन्नाटा छा गया । ढोलक की संजीवनी शक्ति: महामारी की इस भयानक विभीषिका और अंधकार में लुट्टन रात भर अपनी ढोलक बजाता रहता था
। हालाँकि ढोलक की थाप में बुखार हटाने की शक्ति नहीं थी, लेकिन वह अर्द्धमृत और निराश गाँव वालों की नसों में 'संजीवनी शक्ति' भर देती थी, जिससे उन्हें मौत का सामना बिना डरे करने की ताकत मिलती थी । बेटों की मृत्यु और अदम्य साहस: इसी क्रूर महामारी ने लुट्टन के दोनों गठीले बेटों को भी अपना शिकार बना लिया
। लड़कों की अंतिम इच्छा पर लुट्टन उनकी मृत्यु की रात भी ढोलक बजाता रहा और अगले दिन उन्हें नदी में बहा आया । इस असह्य दुख के बावजूद उसकी ढोलक की आवाज़ नहीं रुकी, जिसने गाँव वालों का हौसला दोगुना कर दिया । पहलवान का अंत: चार-पाँच दिन बाद अंततः ढोलक की आवाज़ शांत हो गई और शिष्यों ने लुट्टन की लाश को मृत पड़ा पाया
। जीवन भर अजेय रहने वाले इस पहलवान की अंतिम इच्छा थी कि उसे चिता पर पीठ के बल (चित) नहीं बल्कि पेट के बल सुलाया जाए और चिता सुलगाते समय ढोलक बजाई जाए, क्योंकि वह ज़िंदगी में कभी 'चित' नहीं हुआ था ।
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