दुष्यंत कुमार द्वारा रचित यह गज़ल उनके प्रसिद्ध गज़ल संग्रह 'साये में धूप' से ली गई है
राजनीतिक वादों का खोखलापन: कवि आज़ादी के बाद के झूठे वादों पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि जहाँ हर घर को सुख-सुविधाओं की रोशनी (चिरागाँ) देने का वादा किया गया था, वहाँ अब पूरे शहर के लिए एक भी चिराग उपलब्ध (मयस्सर) नहीं है
। भ्रष्ट और शोषक व्यवस्था: देश के जिन रक्षक संस्थानों (दरख्तों) से जनता को सुख और छाँव मिलनी चाहिए थी, अब उनके नीचे ही शोषण और कष्ट रूपी 'धूप' लगती है
। आम जनता की लाचारी और समझौता: समाज के शोषित और गरीब लोग अपने अधिकारों के लिए विद्रोह करने के बजाय अभावों से समझौता कर लेते हैं; कमीज़ न होने पर वे सिकुड़ कर अपने पैरों से पेट ढँक लेते हैं
। सत्ता चलाने वालों के लिए ऐसे विरोध न करने वाले लोग बहुत मुनासिब (अनुकूल) होते हैं । विद्रोह की आवाज़ और उम्मीद: सत्ताधीश इस बात से पूरी तरह आश्वस्त (मुतमइन) हैं कि उनका पत्थर जैसा कठोर और भ्रष्ट शासन कभी पिघल नहीं सकता
। इसके विपरीत, कवि अपनी आवाज़ में वह असर पैदा करने के लिए बेचैन है जो इस पत्थर को भी पिघला दे । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक: शासक (निज़ाम) अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने की एहतियात के तौर पर शायरों और सच बोलने वालों की जुबान पर पाबंदी लगा देते हैं (उनकी जुबान सिल देते हैं)
। मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण: गज़ल के अंत में कवि 'गुलमोहर' (मानवीय मूल्यों, अधिकारों और आदर्शों) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए कहता है कि यदि जिएँ तो अपने बगीचे में इन्हीं मूल्यों के साथ जिएँ, और मरें तो दूसरों की गलियों में भी इन्हीं आदर्शों की रक्षा के लिए लड़ते हुए जान दे दें
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