यहाँ पर आप कक्षा VI से X तक की PPT, lesson plan, परीक्षा प्रश्न पत्र आदि डाउनलोड करके आप उनमें अपने अनुसार आवश्यक बदलाव कर सकते हैं|

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

11.'नौबतखाने में इबादत'

प्रस्तुत पाठ यतींद्र मिश्र द्वारा रचित एक रोचक व्यक्ति-चित्र 'नौबतखाने में इबादत' है, जो विश्व-प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और उनकी सांगीतिक साधना पर केंद्रित है।

  • शहनाई और डुमराँव का संबंध: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (बचपन का नाम अमीरुद्दीन) का जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट घास) का प्रयोग होता है, वह मुख्यतः डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। यही कारण है कि शहनाई की दुनिया में डुमराँव का विशेष महत्त्व है।

  • काशी और संगीत से जुड़ाव: बचपन में ही बिस्मिल्ला खाँ अपने ननिहाल 'काशी' (वाराणसी) आ गए थे। उनके मामूजान और नाना काशी के बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाया करते थे। यहीं बालाजी मंदिर के रास्ते में पड़ने वाले रसूलनबाई और बतूलनबाई (गायिकाओं) के घर से आते संगीत को सुनकर उनके मन में संगीत के प्रति गहरी आसक्ति पैदा हुई।

  • सुर के प्रति सच्ची इबादत: बिस्मिल्ला खाँ 80 वर्ष की उम्र में भी खुदा से 'सच्चे सुर' की नेमत (वरदान) माँगते थे। वे नमाज़ के बाद सजदे में गिड़गिड़ाते थे कि उन्हें ऐसा सुर मिले जो सुनने वालों की आँखों में आँसू ला दे। उनके लिए संगीत कोई दिखावा नहीं, बल्कि ईश्वर की सच्ची इबादत (उपासना) थी।

  • गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रतीक: एक पक्के मुसलमान होने के बावजूद खाँ साहब की काशी विश्वनाथ, बालाजी मंदिर और गंगा मैया में अपार श्रद्धा थी। मुहर्रम के गमज़दा माहौल में जहाँ वे शहनाई नहीं बजाते थे और फातमान तक पैदल रोते हुए नौहा बजाते जाते थे, वहीं संकटमोचन मंदिर में होने वाले गायन-वादन में भी वे पूरी श्रद्धा से शामिल होते थे। वे भारत की मिली-जुली (सांस्कृतिक) विरासत के सच्चे प्रतीक थे।

  • सादगी और समर्पण: उन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान 'भारतरत्न' मिल चुका था, फिर भी उनमें रत्ती भर भी घमंड नहीं था। एक बार जब उनकी शिष्या ने फटी तहमद (लुंगी) पहनने पर टोका, तो उन्होंने कहा कि भारतरत्न उन्हें उनकी शहनाई पर मिला है, कपड़ों पर नहीं। उनकी ईश्वर से यही दुआ थी: "फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।"

अंततः, यह पाठ बताता है कि 90 वर्ष की आयु में 21 अगस्त 2006 को जब बिस्मिल्ला खाँ दुनिया से विदा हुए, तब तक वे काशी के उस नायाब हीरे के रूप में स्थापित हो चुके थे, जिसने पूरी उम्र 'सच्चा सुर' सीखने की असीम चाह (जिजीविषा) को अपने भीतर ज़िंदा रखा।

1.📥Click here for the quiz

2.📥 Click here to download the PPT

3.📥 Click here to download the PDF

4.📥 Click here to download Competency-Based Questions

5.🧠 Click here to download the Mind Map

6.📚 Click here to download Difficult Words

7.📝 Click here to download the Worksheet

8.📘 Click here to download the Lesson Plan

9.📖 Click here to download Passage-Based Questions

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें