प्रस्तुत पाठ सगुण भक्ति धारा की महान कवयित्री मीराबाई के जीवन-परिचय और उनके एक प्रसिद्ध पद पर आधारित है
मीराबाई का जीवन और उनका संघर्ष:
मीराबाई बचपन से ही श्रीकृष्ण को अपना आराध्य और पति मानती थीं
पद का सार (मेरे तो गिरधर गोपाल...):
एकमात्र समर्पण: मीराबाई स्पष्ट करती हैं कि मोर-मुकुट धारण करने वाले गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) ही उनके एकमात्र पति और सर्वस्व हैं; उनके अलावा दुनिया में उनका कोई अपना नहीं है
। लोक-लाज का त्याग: कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम के कारण उन्होंने अपने कुल की मर्यादा और लोक-लाज को त्याग दिया है और संतों के पास बैठना स्वीकार कर लिया है
। प्रेम रूपी बेल: उन्होंने विरह के आँसुओं से सींच-सींच कर कृष्ण-प्रेम की जो बेल बोई थी, अब वह पूरी तरह फैल गई है और उसमें 'आनंद' रूपी फल लगने लगे हैं
। सार तत्त्व को अपनाना: जिस प्रकार दही को मथकर घी (सार तत्त्व) निकाल लिया जाता है और छाछ (व्यर्थ हिस्सा) को छोड़ दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार मीरा ने संसार का मंथन करके कृष्ण-भक्ति रूपी सार को ग्रहण कर लिया है और सांसारिक मोह-माया को त्याग दिया है
। संसार की दशा पर दुख: मीरा प्रभु के भक्तों को देखकर बहुत प्रसन्न (राजी) होती हैं, लेकिन दुनिया के लोगों को व्यर्थ के सांसारिक कामों और मोह-माया में उलझा देखकर उन्हें रोना आता है
। उद्धार की प्रार्थना: अंत में, वे स्वयं को श्रीकृष्ण की दासी बताते हुए उनसे विनती करती हैं कि हे प्रभु, अब मुझे इस भवसागर से पार उतारो
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