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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

‘आखिरी चट्टान तक’

 ‘आखिरी चट्टान तक’

लेखक कन्याकुमारी पहुँचकर समुद्र के किनारे भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता है। यह स्थान अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है। समुद्र की विशाल लहरों और चट्टानों को देखकर लेखक प्रकृति की अपार शक्ति और भव्यता से प्रभावित होता है। इसी क्षेत्र की एक चट्टान पर स्वामी विवेकानंद ने ध्यान किया था।

लेखक सूर्यास्त देखने के लिए रेत के टीलों की ओर जाता है। वह ऊँचे-ऊँचे टीलों को पार करता हुआ ऐसा स्थान खोजता है जहाँ से सूर्यास्त का पूरा दृश्य दिखाई दे सके। अंत में वह समुद्र में डूबते सूर्य का अद्भुत दृश्य देखता है। सूर्य के बदलते रंग—सोने, लाल, बैंगनी और फिर काले—लेखक को बहुत प्रभावित करते हैं।

अँधेरा होने पर लेखक समुद्र के किनारे से वापस लौटता है। रास्ते में वह रेत के अनेक सुंदर रंगों और समुद्र की बदलती स्थिति को देखता है। बढ़ते पानी के कारण उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता है, लेकिन वह साहस और सूझबूझ से सुरक्षित वापस लौट आता है।

अगले दिन लेखक नाव से विवेकानंद चट्टान पर जाता है। वहाँ उसकी मुलाकात एक पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक से होती है। युवक बताता है कि कन्याकुमारी में बहुत से शिक्षित युवक बेरोजगार हैं और जीविका के लिए छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं। इससे लेखक को प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ समाज की वास्तविक समस्याओं का भी अनुभव होता है।

इस प्रकार यह यात्रा-वृत्तांत केवल कन्याकुमारी के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं करता, बल्कि प्रकृति की भव्यता, मनुष्य की संवेदनाओं, साहस और बेरोजगारी जैसी सामाजिक समस्याओं को भी सामने लाता है।

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