कृश्नचंदर द्वारा रचित कहानी 'जामुन का पेड़' सरकारी कार्यालयों (लालफ़ीताशाही) की विवेकहीन, संवेदनशून्य और अमानवीय कार्यप्रणाली पर एक तीखा हास्य-व्यंग्य है
पेड़ का गिरना और लोगों की प्रतिक्रिया: रात की आँधी में सेक्रेटेरियेट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर जाता है और उसके नीचे एक आदमी दब जाता है
। सुबह जब वहाँ भीड़ इकट्ठी होती है, तो लोग दबे हुए आदमी की जान की परवाह करने के बजाय पेड़ के फलदार होने और रसीली जामुनों के बारे में सोचकर अफ़सोस जताते हैं । फ़ाइलों का सफ़र (लालफ़ीताशाही): दबे हुए आदमी को निकालने के बजाय सरकारी अफ़सरों के बीच फ़ाइल चलने लगती है
। व्यापार विभाग इस मामले को कृषि विभाग पर टाल देता है, और कृषि विभाग इसे फलदार पेड़ बताकर 'हॉर्टीकल्चर डिपार्टमेंट' (उद्यान विभाग) को भेज देता है । हॉर्टीकल्चर विभाग 'पेड़ लगाओ' स्कीम का हवाला देकर पेड़ काटने से साफ़ इनकार कर देता है । अजीबोगरीब सुझाव: इस बीच कुछ लोग आदमी को बीच से काटकर निकालने और फिर प्लास्टिक सर्जरी से जोड़ने का हास्यास्पद सुझाव देते हैं, जिसे मेडिकल डिपार्टमेंट की जाँच के बाद इस आधार पर खारिज कर दिया जाता है कि आदमी मर जाएगा
। कवि होने का पता चलना: जब पता चलता है कि दबा हुआ आदमी एक शायर (कवि) है (उपनाम 'ओस'), तो भीड़ उमड़ पड़ती है और मामला कल्चरल डिपार्टमेंट (साहित्य अकादमी) को सौंप दिया जाता है
। अकादमी का सेक्रेटरी उसे अपनी केंद्रीय शाखा का मेंबर तो बना लेता है और मरने पर उसकी पत्नी को वज़ीफ़ा (पेंशन) देने का वादा करता है, लेकिन आरी-कुल्हाड़ी का काम बताकर उसे बचाने से मना कर देता है और फ़ाइल फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट (वन विभाग) को भेज देता है । अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का बहाना: वन विभाग के लोग जब पेड़ काटने आते हैं, तो विदेश विभाग उन्हें रोक देता है
। कारण यह बताया जाता है कि यह पेड़ दस साल पहले पीटोनिया के प्रधानमंत्री ने लगाया था, और इसे काटने से दो राज्यों के संबंध बिगड़ सकते हैं । त्रासद अंत: अंततः मामला प्रधानमंत्री तक पहुँचता है। वे अंतर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी अपने सिर लेते हुए पेड़ काटने का हुक्म दे देते हैं
। शाम को पाँच बजे सुपरिंटेंडेंट खुशी-खुशी फ़ाइल लेकर आता है कि कल पेड़ काट दिया जाएगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । दबे हुए कवि की मृत्यु हो चुकी होती है और "उसके जीवन की फ़ाइल भी पूर्ण हो चुकी थी" ।
यह कहानी अतिशयोक्तिपूर्ण घटनाओं के माध्यम से हँसाते हुए हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि सरकारी व्यवस्था में नियमों और विभागों के पदानुक्रम के सामने इंसान की जान की कोई कीमत नहीं है
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