प्रस्तुत पाठ आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित एक यात्रा-वृत्तांत है
इस पाठ का मुख्य सार निम्नलिखित है:
प्राकृतिक सौंदर्य: लेखक ने हरिद्वार को तीन ओर से हरे-भरे पर्वतों से घिरी पुण्यभूमि बताया है
। यहाँ के वृक्षों की तुलना एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करते साधुओं और उदार सज्जनों से की गई है, जो अपने फल, फूल, छाल, लकड़ी और यहाँ तक कि जलने के बाद अपनी राख से भी दूसरों का मनोरथ पूरा करते हैं । गंगा की महिमा: गंगा का जल अत्यंत शीतल, स्वच्छ और शक्कर व बर्फ के पने जैसा मीठा है
। यहाँ गंगा दो धाराओं (नील धारा और मुख्य गंगा) में बँट जाती है । हरि की पैड़ी नामक पक्के घाट पर पवित्र स्नान होता है और पास ही एक छोटे पर्वत पर चण्डिका देवी की मूर्ति विराजमान है । प्रमुख तीर्थ: इस क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल हैं
। कनखल वही पवित्र स्थान है जहाँ प्राचीन काल में राजा दक्ष ने यज्ञ किया था और सती ने भगवान शिव का अपमान न सहकर अपना शरीर भस्म कर दिया था । आध्यात्मिक शांति और सादगी: लेखक के अनुसार यहाँ के पंडे (पुजारी) अत्यंत संतोषी हैं और इस निर्मल तीर्थ में क्रोध या लालच वाले मनुष्यों का वास नहीं है
। गंगा तट पर पत्थर पर बैठकर साधारण भोजन करना लेखक को सोने की थाली में खाने से भी अधिक सुखद लगा, जिससे उनके हृदय में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की भावना जागृत हुई । पुण्यभूमि का प्रभाव: यहाँ की भूमि इतनी पवित्र है कि यहाँ उगने वाली कुशा घास से भी दालचीनी और जावित्री जैसी अच्छी सुगंध आती है
। लेखक इस पुण्यभूमि की शांति, सादगी और आनंद से इतने अभिभूत हैं कि वे मानसिक रूप से स्वयं को अब भी वहीं निवास करता हुआ महसूस करते हैं ।
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