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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

4.उत्साह' और 'अट नहीं रही है'

प्रस्तुत पाठ छायावादी युग के प्रमुख कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित दो प्रसिद्ध कविताओं—'उत्साह' और 'अट नहीं रही है'—का संकलन है। इन दोनों कविताओं का सार निम्नलिखित है:

1. उत्साह: यह एक आह्वान गीत है, जो बादलों को संबोधित कर लिखा गया है।

  • बादल के दो रूप: कविता में बादल को दो रूपों में प्रस्तुत किया गया है। एक ओर वह भीषण गर्मी (निदाघ) से प्यासे और पीड़ित जनों की आकांक्षा पूरी करने वाला (जल बरसाकर तप्त धरती को शीतल करने वाला) है। दूसरी ओर, वह नई कल्पना, विप्लव, विध्वंस और क्रांति-चेतना का प्रतीक है।

  • क्रांति और नवजीवन का संदेश: कवि बादलों से रिमझिम बरसने के बजाय ज़ोर से 'गरजने' का आह्वान करता है। बादलों के हृदय में बिजली (वज्र) की शक्ति छिपी है, जो समाज में बदलाव लाने, पुरानी रूढ़ियों को नष्ट करने और लोगों में नवजीवन (नया उत्साह) का संचार करने का कार्य करती है।

2. अट नहीं रही है: यह कविता फागुन (वसंत ऋतु) महीने की मादकता और उसकी सर्वव्यापक प्राकृतिक सुंदरता का सजीव चित्रण करती है।

  • सौंदर्य की अधिकता: फागुन का प्राकृतिक सौंदर्य इतना अधिक और मनमोहक है कि वह प्रकृति के तन में समा नहीं पा रहा है (अट नहीं रही है) और हर जगह से बाहर छलक रहा है।

  • प्रकृति का उल्लास: फागुन की सुगंधित साँसों (हवाओं) से घर-घर महक उठता है। पेड़ों की डालियाँ हरे और लाल पत्तों से लद जाती हैं और चारों ओर मंद सुगंध वाले रंग-बिरंगे फूलों की मालाएँ (मंद-गंध-पुष्प-माल) दिखाई देती हैं। यह मनमोहक दृश्य मन में इतनी उमंग और उल्लास भर देता है कि व्यक्ति का मन कल्पना के पंख लगाकर आसमान में उड़ने को करता है (पर-पर कर देते हो) और कवि चाहकर भी इस प्राकृतिक सौंदर्य से अपनी आँखें नहीं हटा पाता।


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