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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

4.'विदाई-संभाषण'

बालमुकुंद गुप्त द्वारा रचित पाठ 'विदाई-संभाषण' उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य कृति 'शिवशंभु के चिट्ठे' का एक अंश है। यह पाठ भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन (1899-1904 एवं 1904-1905) के शासनकाल के अंत और उनकी विदाई पर लिखा गया एक तीखा व्यंग्य है।

दी गई फ़ाइल "khar104.pdf" के आधार पर इस पाठ का सार इस प्रकार है:

  • शासन का अंत और बिछड़ने का दुख: लेखक बताते हैं कि संसार में हर चीज़ का अंत निश्चित है, और कर्जन का चिरस्थायी प्रतीत होने वाला शासन भी अप्रत्याशित रूप से समाप्त हो गया। यद्यपि भारतवासी कर्जन के शासन से दुखी थे और उनके जाने की प्रार्थना करते थे, फिर भी बिछड़ने का समय स्वभाव से ही करुणा उत्पन्न करने वाला होता है। शिवशंभु की दो गायों का उदाहरण देकर लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि एक दुर्बल गाय भी अपनी साथ रहने वाली बलवान (और मारने वाली) गाय के जाने पर चारा नहीं खाती, जिससे पता चलता है कि बिछड़ते समय पशुओं को भी दुख होता है।

  • कर्जन का अहंकार और पतन: कर्जन ने भारत में असीम शक्ति और शानो-शौकत का उपभोग किया, जैसे दिल्ली-दरबार में सोने की कुर्सी पर बैठना और सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त करना। उन्होंने घमंड में भारतवासियों को गरम तवे पर पानी की बूँदों की तरह नचाया। किंतु उनके शासन का अंत अत्यंत अपमानजनक रहा। एक मनपसंद अंग्रेज़ फ़ौजी अफ़सर की नियुक्ति न होने पर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया, जिसे मंज़ूर कर लिया गया और अंततः उन्हें अपनी धीरता और दृढ़ता को तिलांजलि देकर नीचा देखना पड़ा।

  • निरंकुशता और क्रूर ज़िद: कर्जन ने अपने कार्यकाल में केवल मनमाने हुक्म चलाए और प्रजा की एक नहीं सुनी। लेखक उनकी ज़िद को क्रूर शासक नादिरशाह से भी भयंकर बताते हैं, क्योंकि नादिरशाह ने भी एक प्रार्थना पर दिल्ली का कत्लेआम रोक दिया था। इसके विपरीत, कर्जन ने आठ करोड़ जनता के गिड़गिड़ाने पर भी बंगाल का विभाजन (बंग-विच्छेद) करने की अपनी ज़िद नहीं छोड़ी।

  • उदारता का अभाव: पाठ के अंत में लेखक कर्जन से सवाल करते हैं कि क्या वे जाते समय भारत के प्रति वैसी ही कृतज्ञता दिखाएंगे जैसी राजकुमार 'नर सुलतान' ने विपत्ति के दिनों में आश्रय देने वाले 'नरवरगढ़' के प्रति दिखाई थी। क्या कर्जन जाते हुए भारत से माफी माँगकर उसके प्राचीन गौरव की वापसी की कामना करेंगे? अंत में लेखक स्वयं स्पष्ट करते हैं कि लॉर्ड कर्जन के भीतर इतनी उदारता बिल्कुल नहीं है।

यह संस्मरण कर्जन की तानाशाही, घमंड और उनके दुखद पतन के माध्यम से तत्कालीन भारतीयों की लाचारी को अत्यंत साहसिक और व्यंग्यात्मक ढंग से उजागर करता है।


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