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रविवार, 13 सितंबर 2026

2.'मियाँ नसीरुद्दीन'

कृष्णा सोबती द्वारा रचित शब्दचित्र 'मियाँ नसीरुद्दीन' उनके संस्मरण संग्रह 'हम-हशमत' से लिया गया है। इस पाठ में लेखिका ने एक खानदानी नानबाई (रोटी बनाने वाले) मियाँ नसीरुद्दीन के व्यक्तित्व, रुचियों और उनके पेशे के प्रति उनके समर्पण का सजीव वर्णन किया है। 

  • नानबाइयों के मसीहा से मुलाकात: लेखिका एक दोपहर जामा मस्जिद के पास मटियामहल मुहल्ले में मियाँ नसीरुद्दीन की मामूली-सी दुकान पर पहुँचती हैं। मियाँ नसीरुद्दीन छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने के लिए मशहूर हैं और उन्हें नानबाइयों का मसीहा कहा जाता है।

  • खानदानी पेशा और हुनर पर गर्व: जब लेखिका मियाँ नसीरुद्दीन से रोटी बनाने के इल्म (ज्ञान) के बारे में पूछती हैं, तो वे बड़े गर्व से बताते हैं कि यह उनका खानदानी पेशा है। उन्होंने यह हुनर किसी और से नहीं, बल्कि अपने पिता मियाँ बरकत शाही नानबाई और दादा मियाँ कल्लन से सीखा है।

  • व्यावहारिक तालीम का महत्त्व: मियाँ नसीरुद्दीन का मानना है कि कोई भी काम केवल नसीहतों (सीख) से नहीं आता, बल्कि उसे करने से आता है। वे समझाते हैं कि जिस प्रकार भट्ठी बनाना, उसे आँच देना और बर्तन धोना सीखे बिना नानबाई का असली हुनर नहीं सीखा जा सकता, उसी प्रकार तालीम (व्यावहारिक ज्ञान) की तालीम भी बहुत बड़ी चीज़ होती है।

  • बादशाह और खानदानी नानबाई की कहावत: मियाँ अपने बुजुर्गों का गुणगान करते हुए बताते हैं कि उनके पूर्वज शाही बावर्चीखाने में काम करते थे। उन्होंने बादशाह सलामत को एक ऐसी चीज़ बनाकर खिलाई थी जो न आग से पकती थी और न पानी से बनती थी। उनका मानना है कि "खानदानी नानबाई कुएँ में भी रोटी पका सकता है"। हालाँकि, वे उस पकवान का नाम या उस बादशाह का सही नाम बताने से बचते हैं।

  • कला के कद्रदानों की कमी: बातचीत के अंत में मियाँ नसीरुद्दीन अपनी भट्ठी पर बनने वाली कई प्रकार की रोटियों (बाकरखानी, शीरमाल, ताफ़तान, रूमाली, तुनकी आदि) का ज़िक्र करते हैं। साथ ही, वे एक गहरी साँस लेकर इस बात का अफसोस भी जताते हैं कि अब पहले जैसे कद्रदान नहीं रहे जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते हों; अब तो लोग तंदूर से निकालते हैं और बस निगल लेते हैं।

यह पाठ ऐसे इंसानों का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने पेशे को एक कला मानते हैं और परिश्रम व व्यावहारिक ज्ञान से हुनर हासिल करने पर ज़ोर देते हैं।







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