ओम थानवी द्वारा रचित पाठ 'अतीत में दबे पाँव' सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे प्राचीन और सुनियोजित शहर मुअनजो-दड़ो (मोहनजोदड़ो) की पुरातात्विक यात्रा और वहाँ की संस्कृति का सजीव ऐतिहासिक दस्तावेज़ है
अद्भुत नगर-नियोजन: मुअनजो-दड़ो अपने उत्कृष्ट नगर-नियोजन ('ग्रिड प्लान') के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं
। पक्की ईंटों से बने घर, ढकी हुई सुव्यवस्थित नालियाँ, हर घर में स्नानघर और लगभग सात सौ कुओं की मौजूदगी इसे इतिहास की एक बेहतरीन 'जल-संस्कृति' साबित करती है । प्रमुख संरचनाएँ: यहाँ के खंडहरों में एक अद्वितीय 'महाकुंड' मिला है, जिसका उपयोग संभवतः किसी सामूहिक अनुष्ठान के लिए किया जाता था
। इसके अतिरिक्त, कर के रूप में प्राप्त अनाज जमा करने के लिए बड़ा 'कोठार', ज्ञानशालाएँ, सभा-भवन और शहर के सबसे ऊँचे चबूतरे पर एक बौद्ध स्तूप (जो बाद की सदी का है) मिला है । शांतिप्रिय और आडंबरहीन सभ्यता: अजायबघर में रखे सामानों में औज़ार तो हैं, लेकिन कोई हथियार नहीं मिला है
। इससे सिद्ध होता है कि यह सभ्यता सैन्य-ताकत के बल पर नहीं, बल्कि आपसी समझ और सामाजिक व्यवस्था से अनुशासित थी । यहाँ भव्य राजप्रसाद या बड़े मंदिर नहीं मिले हैं, जो दर्शाता है कि इस संपन्न सभ्यता में शक्ति-प्रदर्शन या 'दिखावे' (आडंबर) का तेवर नदारद था । समाज-पोषित सौंदर्य-बोध: मुअनजो-दड़ो के लोग तकनीक-सिद्ध होने से ज़्यादा कला-सिद्ध थे
। धातु और पत्थर की मूर्तियाँ (प्रसिद्ध 'नर्तकी' और दाढ़ी वाले 'नरेश' की मूर्ति), मिट्टी के बर्तन, मुहरें, खिलौने, आभूषण और बारीक कशीदाकारी उनके उच्च सौंदर्य-बोध को प्रमाणित करते हैं । यह सौंदर्य-बोध राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर पूरी तरह 'समाज-पोषित' था । उन्नत कृषि व्यवस्था: नई खोजों से यह सिद्ध हो चुका है कि यह मूलतः एक उन्नत खेतिहर और पशुपालक सभ्यता थी
। यहाँ के लोग कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने की खेती करते थे और यहाँ सूत की कताई-बुनाई के साथ रंगाई का काम भी होता था ।
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