प्रस्तुत पाठ भक्तिकाल के श्रेष्ठ कवि सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' प्रसंग से लिया गया है
पहला पद (उद्धव पर व्यंग्य): गोपियाँ उद्धव को व्यंग्य में 'बड़भागी' (भाग्यशाली) कहती हैं क्योंकि वे कृष्ण के समीप रहकर भी उनके प्रेम से वैसे ही अछूते हैं जैसे जल में रहकर भी कमल का पत्ता या तेल की गगरी
। गोपियाँ स्वयं को भोली अबला बताती हैं, जो कृष्ण के प्रेम में वैसे ही चिपकी हैं जैसे गुड़ से चींटियाँ । दूसरा पद (विरह वेदना और मर्यादा): गोपियाँ स्वीकार करती हैं कि कृष्ण से मिलने की उनकी सारी अभिलाषाएँ मन में ही रह गईं
। वे कृष्ण के आने की आस में वियोग सह रही थीं, लेकिन उद्धव के शुष्क योग-संदेश ने उनकी विरहाग्नि को और भड़का दिया । वे शिकायत करती हैं कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का पालन नहीं किया ('मरजादा न लही') । तीसरा पद (एकनिष्ठ प्रेम): गोपियों ने कृष्ण को 'हारिल की लकड़ी' के समान बताया है जिसे उन्होंने मन, कर्म और वचन से अपने हृदय में दृढ़तापूर्वक पकड़ रखा है
। उन्हें उद्धव का योग-संदेश 'कड़वी ककड़ी' के समान अरुचिकर लगता है । वे कहती हैं कि यह योग का ज्ञान उन्हें सौंपें जिनका मन चंचल (चकरी के समान) है, क्योंकि गोपियों का मन तो केवल कृष्ण में स्थिर है । चौथा पद (कृष्ण की राजनीति और राजधर्म): गोपियाँ ताना मारती हैं कि कृष्ण अब मथुरा जाकर 'राजनीति' पढ़ आए हैं और बहुत चतुर हो गए हैं
। जो कृष्ण पहले दूसरों को अन्याय से बचाते थे, वे ही अब योग-संदेश भेजकर गोपियों पर अन्याय (अनीति) कर रहे हैं । अंत में गोपियाँ उद्धव को सच्चा 'राजधर्म' याद दिलाती हैं, जिसके अनुसार राजा का कर्त्तव्य अपनी प्रजा को सताना नहीं, बल्कि उनके हितों की रक्षा करना है ।
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