प्रस्तुत पाठ सुप्रसिद्ध साहित्यकार महादेवी वर्मा द्वारा रचित प्रसिद्ध संस्मरणात्मक रेखाचित्र 'भक्तिन' पर आधारित है, जो उनकी पुस्तक 'स्मृति की रेखाएँ' में संकलित है। इस पाठ में एक संघर्षशील, स्वाभिमानी और कर्मठ ग्रामीण स्त्री के जीवन और पितृसत्तात्मक समाज में उसके संघर्ष का मार्मिक चित्रण किया गया है।
नाम और वास्तविक जीवन का विरोधाभास: भक्तिन का असली नाम 'लछमिन' (लक्ष्मी) था, लेकिन उसका जीवन इसके बिल्कुल विपरीत अभावों और संघर्षों से भरा था, इसलिए वह अपना असली नाम छिपाती थी
। उसके गले में कंठी माला और वैरागिन जैसी वेशभूषा देखकर ही महादेवी वर्मा ने उसका नाम 'भक्तिन' रख दिया था । बचपन और पारिवारिक उपेक्षा (पहला और दूसरा परिच्छेद): पाँच वर्ष की उम्र में ब्याही गई भक्तिन की विमाता (सौतेली माँ) ने नौ वर्ष की उम्र में उसका गौना कर दिया था
। ससुराल में लगातार तीन बेटियों को जन्म देने के कारण उसे अपनी सास और जिठानियों (जिनके काले-कलूटे बेटे थे) की घोर उपेक्षा और ताने सहने पड़े । हालाँकि, पति के अगाध प्रेम के कारण उसने अपना घर अलग कर लिया और अपनी मेहनत से खेती-बारी को समृद्ध बना लिया । लेकिन 36 वर्ष की आयु में ही पति का देहांत हो गया । समाज का अन्याय और शहर की ओर प्रस्थान (तीसरा परिच्छेद): पति की मृत्यु के बाद संपत्ति हड़पने के लिए उसके जेठ-जिठानियों ने साज़िश रची
। उसकी बड़ी विधवा बेटी को फँसाने के लिए जेठ के बेटे ने अपने निकम्मे (तीतरबाज़) साले को उसके कमरे में घुसा दिया । पंचायत ने अन्यायपूर्ण फैसला सुनाते हुए बेटी की शादी उस निकम्मे युवक से करवा दी, जिससे पारिवारिक द्वेष बढ़ा और खेती नष्ट हो गई । लगान न चुका पाने पर ज़मींदार द्वारा दिनभर कड़ी धूप में खड़ा किए जाने के अपमान से आहत होकर भक्तिन शहर (महादेवी के पास) आ गई । महादेवी वर्मा के साथ जीवन (चौथा परिच्छेद): लेखिका के घर आकर उसने देहाती भोजन (मकई का दलिया, ज्वार की खिचड़ी) खिला-खिलाकर महादेवी वर्मा को भी देहाती बना दिया, लेकिन खुद कभी शहर की हवा से प्रभावित नहीं हुई
। वह अपनी बात को सही साबित करने के लिए तर्क गढ़ने में माहिर थी । अटूट आत्मीयता और समर्पण: भक्तिन और लेखिका का संबंध मात्र स्वामी-सेवक का नहीं था, बल्कि वह लेखिका के जीवन की एक अपरिहार्य छाया बन चुकी थी
। रात की निस्तब्धता में लेखिका के साथ जागना हो या जेल जाने की बात, वह हर परिस्थिति में महादेवी वर्मा का साथ निभाने के लिए दृढ़ थी । यह रेखाचित्र स्त्री-अस्मिता और उसकी खामोश लेकिन मज़बूत आवाज़ का एक उत्कृष्ट दस्तावेज़ है ।
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