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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

कक्षा 8, पाठ 10. 'तरुण के स्वप्न'

प्रस्तुत पाठ नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में दिए गए प्रेरक उद्बोधन (भाषण) 'तरुण के स्वप्न' पर आधारित है।

  • सपनों की विरासत: नेताजी बताते हैं कि एक आदर्श राष्ट्र का जो स्वप्न महान नेता देशबंधु चित्तरंजन दास ने देखा था, आज हम उसी स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं और यही स्वप्न हमारे जीवन, कार्य और संघर्ष की मूल प्रेरणा है।

  • आदर्श समाज की रूपरेखा: नेताजी एक ऐसे सर्वांगीण, स्वाधीन और संपन्न समाज की कल्पना करते हैं जिसमें:

    • व्यक्ति सभी दृष्टियों से मुक्त हो और उस पर समाज का कोई अनुचित दबाव न हो।

    • समाज में जातिभेद और आर्थिक विषमता (अमीरी-गरीबी का भेदभाव) का कोई स्थान न हो।

    • नारियाँ पूरी तरह मुक्त हों और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार व राष्ट्र-सेवा के अवसर मिलें।

    • प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और अपनी उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों।

    • श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो तथा आलसी और अकर्मण्य (निकम्मे) लोगों के लिए समाज में कोई जगह न हो।

  • विश्व के लिए एक आदर्श: नेताजी चाहते थे कि हमारा राष्ट्र किसी भी बाहरी (विजातीय) प्रभाव से मुक्त हो। यह राष्ट्र न केवल भारतवासियों का अभाव (गरीबी) मिटाए, बल्कि पूरे विश्व के सामने एक आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र के रूप में मिसाल बने।

  • युवाओं का आह्वान: नेताजी देश के युवाओं (तरुणों) को अपना यह महान स्वप्न उपहार स्वरूप सौंपते हैं। उनका मानना है कि इस आदर्श को साकार करने के लिए अपार शक्ति और आनंद मिलता है; इसके लिए हर प्रकार का त्याग और कष्ट सहा जा सकता है, और यदि इस स्वप्न के लिए प्राण भी देने पड़ें तो 'वह मरण भी स्वर्ग के समान' है।


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