भारति, जय, विजयकरे!
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘भारति, जय, विजयकरे!’ में कवि ने भारतमाता के सुंदर, भव्य और गौरवशाली स्वरूप का वर्णन किया है। कवि भारतमाता की विजय और यश की कामना करते हुए उनकी स्तुति करता है।
कवि के अनुसार भारतमाता सुनहरी फसलों और कमलों को धारण करने वाली हैं। समुद्र की गरजती हुई लहरें उनके पवित्र चरणों को धोती हुई उनकी महिमा का गुणगान करती हैं। भारत के वृक्ष, घास, वन और लताएँ भारतमाता के वस्त्रों के समान हैं तथा उनके आँचल में खिले हुए सुंदर फूल जड़े हुए हैं। गंगा की उज्ज्वल जलधारा उनके गले में पड़े मोतियों के हार जैसी दिखाई देती है।
भारत के उत्तर में स्थित हिमालय की बर्फीली चोटियाँ भारतमाता के मस्तक पर सुशोभित मुकुट के समान हैं। भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महानता को कवि ‘ओंकार’ की पवित्र ध्वनि के माध्यम से व्यक्त करता है। भारत की उदारता, संस्कृति और गौरव की आवाज़ सभी दिशाओं में गूँज रही है।
इस प्रकार कवि ने भारत को एक सजीव और सुंदर देवी के रूप में चित्रित किया है। कविता में भारत की प्राकृतिक सुंदरता, आध्यात्मिकता, सांस्कृतिक समृद्धि और देशप्रेम की भावना का सुंदर चित्रण हुआ है।
मुख्य भाव:
कविता का मुख्य भाव देशभक्ति और भारतमाता के गौरव का गान है। कवि भारत की प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक-सांस्कृतिक महानता को देखकर उसकी विजय और यश की कामना करता है।
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