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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

क्या लिखूँ?

  क्या लिखूँ?


क्या लिखूँ? — पाठ का सारांश

‘क्या लिखूँ?’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित एक रोचक और विचारप्रधान निबंध है। इसमें लेखक ने निबंध लिखने की प्रक्रिया, लेखक की मानसिक स्थिति तथा मौलिक विचारों के महत्त्व को अपने अनुभवों के माध्यम से समझाया है।

लेखक को नमिता और अमिता नाम की दो छात्राओं के लिए आदर्श निबंध लिखने हैं। एक विषय है ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और दूसरा ‘समाज-सुधार’। लेखक इन विषयों पर लिखने के लिए बैठते हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या आती है कि क्या लिखें और कैसे लिखें

लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर के विचार को याद करते हैं। उनके अनुसार लिखने के लिए लेखक के मन में एक विशेष प्रकार की उमंग, स्फूर्ति और विचारों का आवेग होना चाहिए। इसके बाद लेखक निबंध लिखने की परंपरागत पद्धति पर विचार करते हैं। विद्वानों के अनुसार निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा तैयार करनी चाहिए, लेकिन लेखक को दिए गए विषयों की रूपरेखा बनाना भी कठिन लगता है।

‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ विषय पर विचार करते हुए लेखक बताते हैं कि जो वस्तु या समय हमसे दूर होता है, वह हमें अधिक अच्छा और आकर्षक दिखाई देता है। युवा लोगों को संसार दूर से सुंदर दिखाई देता है, जबकि वृद्ध लोगों को अपना बचपन और युवावस्था सुखद लगती है।

लेखक समाज-सुधार जैसे गंभीर विषय पर भी विचार करते हैं और बताते हैं कि समाज-सुधार की बातें करना आसान है, लेकिन उसे वास्तविक जीवन में लागू करना कठिन है। वे अनेक महान व्यक्तियों और साहित्यकारों के विचारों का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सच्चा लेखन केवल विद्वता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि लेखक के अपने अनुभवों और विचारों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति होना चाहिए।

अंततः लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निबंध का विषय ही सबसे महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि लेखक के मौलिक विचार, अनुभव और भाव उसकी वास्तविक शक्ति होते हैं। सच्चा और प्रभावशाली लेखन वही है जिसमें लेखक अपने मन की बात स्वाभाविक रूप से व्यक्त करता है।

मुख्य संदेश: इस पाठ के माध्यम से लेखक हमें सिखाते हैं कि अच्छा लेखन केवल नियमों और रूपरेखा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसमें मौलिक चिंतन, व्यक्तिगत अनुभव, सहज अभिव्यक्ति और भावों की सच्चाई होना आवश्यक है।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

📥1. दो बैलों की कथा

 📥 दो बैलों की कथा 📥 


दो बैलों की कथा’ — सारांश

‘दो बैलों की कथा’ मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी है। इसमें हीरा और मोती नामक दो बैलों के माध्यम से पशु-प्रेम, मित्रता, स्वाभिमान, स्वतंत्रता और निष्ठा की भावना को व्यक्त किया गया है।

हीरा और मोती अपने मालिक झूरी के बहुत प्रिय बैल थे। दोनों में गहरी मित्रता थी और वे एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ रहते थे। एक दिन झूरी की पत्नी उन्हें अपने मायके भेज देती है। वहाँ उनके साथ कठोर व्यवहार किया जाता है और उन्हें पर्याप्त भोजन भी नहीं मिलता। वे दुखी होकर वहाँ से भाग निकलते हैं और अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए वापस झूरी के घर पहुँच जाते हैं।

बाद में उन्हें फिर से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। वहाँ भी उनसे बहुत अधिक काम लिया जाता है। एक समय उन्हें कसाई के हाथ बेच दिया जाता है, लेकिन दोनों बैल अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं और वहाँ से भाग निकलते हैं। रास्ते में उन्हें एक छोटी बच्ची के प्रति भी स्नेह और करुणा का भाव दिखाते हुए देखा जाता है।

अंततः हीरा और मोती वापस अपने मालिक झूरी के पास पहुँच जाते हैं। झूरी उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न होता है और दोनों बैलों का स्वागत करता है।

कहानी का मुख्य संदेश:
प्रेम और स्नेह केवल मनुष्यों में ही नहीं, बल्कि पशुओं में भी होते हैं। हीरा और मोती की मित्रता यह सिखाती है कि सच्ची मित्रता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की भावना किसी भी जीव में हो सकती है। कहानी पशुओं के प्रति दयालु और संवेदनशील व्यवहार करने की प्रेरणा भी देती है।


1. दो बैलों की कथा  PPT

2. पाठ योजना DOWNLOAD


 

सोमवार, 13 जुलाई 2026